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आजादी के सही मायने क्या हैं.....

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 नई दिल्ली । अनिल कुमार

देश में एक बार फिर स्वाधिनता दिवस सोमवार को स्वतंत्रता दिवस या आजादी के दिन के अवसर पर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, अराजकता, बेरोजगारी, भूखमरी, अस्वास्थ्य की स्थित और गरीबी की वजह से अनेक लोगों के लिये 15 अगस्त को अंग्रेजों की जंजीरों से मिली आजादी एक भूली बिसरी घटना हो गयी है। आजादी को अब 69 साल बीत चुके हैं और इस साल हमलोगों ने 70वें साल में प्रवेश किया जिसकी खुशी बहुत हीं हर्षोल्लास के साथ पूरे देश ने मनाया, इसका मतलब यह हुआ कि आजाद भारत में हर परिवार की पांच से सात पीढ़ियों ने इस दौरान इस देश में सांस ली होगी। लेकिन हम देखते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी एतिहासिक घटनाओं की स्मृतियां फीकी पड़ती जा रही हैं। अगर 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस हर वर्ष औपचारिक रूप से पूरे देश में न मनाया जाये तो शायद हीं आज की पीढ़ी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के दिन को याद रख पाती। वैसे अभी भी यदि आप सरकारी स्कूलों या फिर बहुत सारे प्राईवेट स्कूलों के सिनियर क्लास के बच्चों से सवाल पूछा जाए के देश को आजादी कब मिली या फिर संविधान लागू कब हुआ या फिर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत क्या है तो शायद अधिक से अधिक जवाब यही होगा कि पता तो था पर अभी भूल गये हैं। या फिर उल्टा जवाब मिलेगा। मसलन राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान और स्वाधीनता दिवस को गणतंत्र दिवस के रूप में बता देंगे। पिछले 69 सालों से हम स्वतंत्रता दिवस निंरतर औपचारिक रूप से मनाते आ रहे हैं जिसके बाद भी हमारे देश की स्थिति ऐसी है तो फिर सोंचइये कि आने वाले समय ऐसे तारीखों का क्या होगा जो राष्ट्र के साथ जुड़ा हुआ है।
       आपको यहां पर यह बताते चलें कि ऐतिहासिक स्मृतियों की आयु कम होने का कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य की विषयों में लिप्तता इस कदर रहती है कि उसमें सक्रियता का संचार नित नई एतिहासिक घटनाओं का सृजन करता है। मनुष्य जाति की इसी सक्रियता के कारण ही जहां इतिहास दर इतिहास बनता है वहीं उनको विस्मृत भी कर दिया जाता है। हर पीढ़ी उन्हीं घटनाओं से प्रभावित होती है जो उसके सामने होती हैं। वह पुरानी घटनाओं को अपनी पुरानी पीढ़ी से कम ही याद रखती है। इसके विपरीत जिन घटनाओं का अध्यात्मिक महत्व होता है उनको सदियों तक गाया जाता है। हिन्दी के स्वर्णिम काल में संत कबीर, मानस हंस तुलसी, कविवर रहीम, और भक्तमणि मीरा ने हमारे जनमानस को आंदोलित किया तो उनकी जगह भी ऐसी बनी है कि वह हमारे इतिहास में भक्त स्वरूप हो गये और उनकी श्रेणी भगवान से कम नहीं बनी। हम इन महामनीषियों के संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित इस संदेश का उल्लेख कर सकते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘जैसे भक्त मुझकों भजते हैं वैसे ही मैं उनको भजता हूं’। अनेक विद्वान तो यह भी भी कहते हैं कि भक्त अपनी तपस्या और सृजन से भगवान की अपेक्षा बड़े हो जाते हैं। ब्रिटिश राज के हुकमतों से आजादी की भूख ने देश में हजारों देशभक्त पैदा कर दिये। स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक महापुरुष अवतरित हुए जिन्होंने अपने दम पर अंग्रेजों के होश पस्त कर दिये आर अंततः वह बेला भी आई जब अंग्रेजों को यह ऐहसास हुआ कि अब भारत में अपनी सलतनत को बजाये रख पाना संभव नहीं है। इन्हीं वीर पुरूषों की गाथा और आजादी के लिए देश को समर्पित उनके योगदान की कहानियों और इतिहास को पढ़ते हैं, समझते हैं और 15 अगस्त के दिन या गणतंत्र दिवस के दिन याद करते हैं। लेकिन सबसे हैरानी की बात है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में याद आने वाले महापुरूषों को हम बाकी दिनों में भूल जाते हैं। लाउड़स्पीकर पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले हमारे देश के नेता हो या समाजसेवी या फिर अन्य आम नागरिक जो इन दिनों में स्वंय को राष्ट्र का सबसे बड़ा देशभक्त बताते नहीं थकते वे आजादी के महापुरूषों के विचारों को धत्ता बताकर देश के शान और शौकत के विपरित व्यवहार करते हैं, जबकि आजादी के नायक हमेशा देश के लिए मर-मिटने को तत्पर रहते थे।         
आपको यहां पर यह भी बताते चलें कि हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आज़ादी तथा देश भक्ति का नारा इस लिए लगाया जाता था ताकि सभी देशवासियों के दिल में देशप्रेम की भावना जागे और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाले देशप्रेमियों को प्रोत्साहन मिले लेकिन आज के तथाकथित देशभक्त उन्हीं नारों का प्रयोग अपने राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ती के लिए कर रहे हैं, अपनी राजनीतिक सभाओं नमें भीड़ को एकत्रित करने  के लिए कर रहे हैं। जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन होता है तो उस समय मातृभूमि का नारा देकर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के प्रयास होते हैं जिनसे प्रभावित होकर लोगों की भीड़ जुटती भी है। हालांकि यह भी सत्य है कि भीड़ को एकत्रित करने वाले इन्हीं गानों में वह ताकत और मधुरता है जिसमें लोग राष्ट्रप्रेम की धारा में बहते चले जाते हैं, आज भी स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा अन्य राष्ट्रीय पर्वों पर बजने वाले राष्ट्रगीत और लगने वाले नारे भाव विभोर कर देते हैं और करोड़ों देशवासियों को झूमने पर मजबूर कर देता है। 
      आपको यहां पर एक खास बात से अवगत कराना जरूरी समझता हूं कि देश को स्वतंत्रत हुए 69 वर्ष हो गये हैं लेकिन आज भी हमारे देश की स्थिति आर्थिक, समाजिक और राजनैतिक रूप से विश्व के अन्य कुछ छोटे देशों से भी पीछे खड़ा है। इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण होने के बाद तो यह स्थिति हो गयी है कि उच्च मध्यम वर्ग अमीरों में शामिल हो गये हैं, तो गरीब लोग अब गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गये हैं। यदि भारत सरकार के आंकड़ों की हीं मानें तो देश में करोड़पतियों की संख्या में बढ़ोतरी हो गयी है जबकि समाज के हालत बता रहे हैं कि बेरोजगारी उससे कई गुना बढ़े हैं। यही कराण है कि हमारे देश ने विकास की गति की रफ्तार तो पकड़ी लेकिन सिर्फ एकल दिशा में और दूसरी और बेरोजगारों की फौज तैयार होती गई परिणामतः विकास दर के साथ अपराध दर भी तेजी से बढ़ी है। आधुनिक तकनीकी जहां विकास में योगदान दे रही है तो उसके सहारे अपराध के नये नये तरीके भी इजाद हो गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा है। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो 70 वर्ष पूर्व मिली आजादी पर ही सवाल उठा रहे हैं। अनेक लोग तो अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ करने की आवश्यकता बता रहे हैं। मातृभूमि की रक्षा के नारे की गूंज इतनी तेज हो उठती है कि सारा देश खड़ा होता है। तब ऐसा लगता है कि देश में बदलाव की बयार बहने वाली है पर बाद में ऐसा होता कुछ नहीं है। वजह साफ है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा नारों से नहीं होती न ही तलवारें लहराने या हवा में गोलियां चलाने से शत्रु परास्त होते हैं।
          यहां पर आपको बताना चाहूंगा कि राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा के लिये सतत और गंभीर प्रयास करने होते हैं। अपने नागरिकों को ज्ञान और विज्ञान से परिचय कराना होता है। उनका नेतृत्त करने वालों को न केवल मानसिक रूप से सक्षम होना चाहिए बल्कि उनमें धैर्य और साहस भी होना चाहिए। समाज के नागरिक वर्ग के लोग आर्थिक रूप से उत्पादक, भेदभाव से रहित तथा सत्यमार्गी होना चाहिए। विश्व के वर्तमान परिस्थिति को देखें तो सबकुछ समझ आएगा कि विश्व के सभी देशों की हालत कैसी है। विकसित कहलाने वाले पश्चिमी राष्ट्र अब आर्थिक रूप से लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि उनके यहां अनुत्पादक नागरिकों का वर्ग बढ़ रहा है। ठीक इसके विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और वजह साफ है कि हमारे देश में युवा नागरिकों की तादाद अभी बाकी देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है। लेकिन जिस तरह हमने पश्चिम देशों के विचारों को स्थान देते चले जा रहे हैं  वह दिन दूर नहीं जब हमारे यहां भी अनुत्पादक नागरिक वर्ग बढ़ने लगेंगे और एक बार फिर से आर्थिक लाचारी से देश को गुजरना पड़ सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा का नारा लगाना अलग बात है पर उसके लिये सतत और गंभीर प्रयास करते रहना अलग बात है जिसे हम तमाम राजनैतिक, समाजिक बुद्धिजीवियों को समझना पड़ेगा। देश में फैल रहे अराजकता, बेरोजगारी, अशिक्षा, महिलाओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने वाले, देशभक्ति का चोला पहनकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले, जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाले, अमीर-गरीब के आधार पर भेदभाव करने वाले, राष्ट्रहित के फैसलों में दखल देने वाले, भ्रष्टाचार कर देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले, गरीबों के साथ अत्याचार करने वाले, देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ करने वाले, निजी हित के लिए राष्ट्रीय संपदा व गरीबों के अधिकारों का हनन करने वाले, देश की अखंडता को ताक पर रखकर देश के नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वाले, सामाजिक गतिविधियों में नाकारात्मक विचार को प्रसारित करने वाले, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समाज व देश में हिंसा व तनाव फैलाने वाले तत्वों से निपटना और देश को स्वच्छ राजनीतिक माहौल प्रदान करना हीं सहीं मायने में आजादी का मतलब होगा। 
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