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कौन जाने, किसको पता आखिर क्या चाहती है महिलाएं....

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नई दिल्ली । अनिल कुमार

नारी.. यह शब्द सुनते हीं हमारे मन में एक अलग तरह का ख्याल और तस्वीर ऊभर कर आती है। भारतीय समाज, परंपरा, रीति रिवाज और महिलाओं के खिलाफ कुछ जानबुझकर उत्पन्न किये गये हालातों को ध्यान में केंद्रित करें तो हमें महिलाओं के बहुत से रूप देखने को मिलेंगे। वैसे यह भी बात अनादि काल से सत्य है कि महिलाओं को आजतक किसी ने समझ नहीं पाया है। वेद, शास्त्र, पुराण, कुरान, बाईबल या अन्य किसी धर्म ग्रंथ की बात करें तो सबने औरतों के बारे में एक जैसा लिखा है, उनके विभिन्न रूपों को दर्शाया है और उनके विभिन्न चरित्रों को समझाने का प्रयास किया है। लेकिन औरतें आखिर चाहती क्या हैं, यह आजतक किसी ने समझ नहीं पाया है। सदियों से एक आम आदमी से लेकर मनोविज्ञानिकों व वैज्ञानिकों तक को इस सवाल ने सोचने पर मजबूर किया है। वेदों में वर्णित ऋषि विश्वामित्र व रामायण के राम से लेकर आधुनिक युग के महानतम मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड और हॉलीवुड़ अभिनेता मेल गिब्सन भी महिलाओं के विभिन्न चरित्रों को समझने में नाकाम रहे हैं और हमेशा से इस सवाल के जवाब को तलाशते रहे कि आखिर औरतें क्या चाहती हैं? महिलाओं से संबंधित हजारों किताबें, ब्लॉग, लेख और समाचार पत्रों में खबरें लिखी जा चुकी हैं। लाखों लोग हजारों मंचों पर महिलाओं के बारे में चर्चायें कर चुके हैं, लाखों बार बहस हो चुकी है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किताब, ब्लॉग या लेख लिखने वालों में सिर्फ पुरूष हीं नहीं बल्कि हजारों की संख्या में महिलाएं भी हैं। औरतें खुलकर इस सवाल के जवाब के लिए चर्चा करती दिखती हैं। लेकिन हाजरों किताबें लिखने और लाखों लोगों के बीच इस सवाल पर बहस होने के बाद, साथ हीं सैंकड़ों रिसर्च होने के बाद भी औरतों की इच्छाओं और ख्वाहिशों की कोई एक परिभाषा या कोई एक दायरा तय नहीं किया जा सका है और न हीं यह तय किया जा सका कि आखिर औरतों के अंदर ख्वाहिशें कैसे जगती है और उन्हें संतुष्ट कैसे किया जा सकता है।
यह बात अनादिकाल से बिल्कुल सत्य है और कई रिसर्चों के बाद यह तथ्य सामने आया है  कि औरतें मानसिक सुख की ख्वाहिशों से ज्यादा शारीरिक संबंध के ख्वाहिशों की पूर्ती होने पर संतुष्ट भी होती हैं और खुश भी रहती हैं। कई रिसर्चों से यह भी साबित हो चुका है कि औरतें अपनी कामेच्छा के बारे में पुरातन ख्यालों और बंधे-बंधाये नियमों, रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर आगे आ रही हैं और महिलाओं को कभी शारीरिक संबंध से संतुष्ट नहीं किया जा सकता जैसी मिथ्या धारना को खत्म कर रही हैं। इस बात को गलत साबित कर रही हैं कि महिलाओं को सेक्स की ज्यादा भुख होती है या उनमें उत्तेजना ज्यादा होती है। परन्तु वैज्ञानिक इस बात को जरूर मानते हैं कि औरतों के सेक्स कैपेसिटी को किसी एक दायरे में नहीं बांधा जा सकता। चूंकि भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग जलवायु के कारण प्रत्येक महिलाओं में अलग-अलग सेक्स कैपेबिलिटी होती है और कभी-कभी यह भी देखने को मिलता है कि एक हीं औरत के लिए अलग-अलग समय में अलग-अलग सेक्स कैपेबिलिटी और सेक्स ख्वाहिश के अलग दौर होते हैं। 
जैसे-जैसे तकनीक ने अपना विकास का दायरा बढ़ाया है वैसे हीं यह बात भी सामने आई है कि औरतों  और मर्दों के सेक्स ख्वाहिश में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। लेकिन पहले यह धारना फैली हुई थी कि औरतें मर्दों के मुकाबले सेक्स की ज्यादा भुखी होती है। उन्हें खुश करना हो तो उसके सेक्स की भुख को मिटाना होगा, उसे संतुष्ट करना होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि महिलाओं और पुरूषों में कमोबेश एक हीं जैसा सेक्स ख्वाहिश होता है। मेरा मानना है कि आमजीवन में यदि सांसारिक लोगों से पूछा जाए कि आप एक-दूसरे के साथ एक दिन में कितनी बार सेक्स का ख्वाहिश रखते हैं या इच्छा होती है तो लगभग औरतों और पुरूषों में एकसमान उत्तर निकल कर सामने आएगा। इससे यह भी बात पता चलता है कि औरतों में सेक्स की इच्छा कम भी नहीं होती है। हालांकि यह भी सत्य है कि औरतों की ख्वाहिशें अलग प्रकार की होती है।
आपको यह जानकर थोड़ा हैरानी हो सकता है लेकिन यह वैज्ञानिक रिसर्च में साबित हो चुका है कि औरतों में मासिक धर्म के अनुसार सेक्स की चाहत घटती-बढ़ती रहती है। मासिक धर्म शुरू होने से पहले औरतों में सेक्स की चाहत ज्यादा महसूस होती है। यह भी बात बिलकुल सत्य है कि सेक्स बच्चे पैदा करने का एक बुनियादी जिम्मेदारी है। इसलिए जब महिलाओं के अंदर अंडाणु बनने लगते हैं तब उन्हें सेक्स की चाहत ज्यादा महसूस होती है। डॉक्टरों का पहले और अब भी यह मानना है कि मर्दों का हरमोन टेस्टोस्टेरॉन महिलाओं में यौन इच्छा को जगाता है इसलिए सेक्स की इच्छा न रखने वाले महिलाओं को डॉक्टर टेस्टोस्टेरॉन लेने की सलाह देते हैं। जबकि कई रिसर्च से इस बात की पुष्टी हो चुका है कि औरतों में सेक्स की इच्छा जगाने के लिए टेस्टोस्टेरॉन का कोई सीधा संबंध नहीं। बल्कि सेक्स की चाहत के असर से हारमोन का बहाव तेज होता है जिससे सेक्स की चाहत पैदा होती है।
सेक्स संबंधी मामलों की जानकारी रखने वालों की मानें तो औरतों में सेक्स के दौरान अलग-अलग प्रकार के एहसास होते हैं। यह कोई जरूरी नहीं है कि महिलायें मर्दों की तरह उत्तेजना, चरमोत्कर्ष और तसल्ली के एहसास से रूबरू हो और वह तुरंत संतुष्ट हो जाए। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि उन्हें ऑर्गेज्म पहले महसूस हो और साथी के छुअन की ज़रूरत बाद में। उन्हें उत्तेजित करने के लिए हर बार यौन अंगों से छेड़खानी करनी पड़े, ऐसा भी ज़रूरी नहीं है। कई बार इसके ख़्याल से ही उन्हें तसल्ली हो जाती है। महिलाओं के लिए सेक्स एक दिमाग़ी तजुर्बा है जबकि मर्दों के मामले में ऐसा हमेशा नहीं होता है। कई महिला सेक्स जानकारों की मानें तो यह कतई जरूरी नहीं है कि महिलाओं की हर ख्वाहिश को हर बार सेक्स करके हीं पूरा किया जाए। हर औरत अलग तरह से अपने को तसल्ली महसूस करती है। यह बात तो मैं पहले हीं बता चुका हूं कि अलग-अलग वक्त में एक हीं औरत अलग-अलग तरह के एहसास से गुजरती है। यह बात भी बहुत हीं महत्वपूर्ण है कि कई दफा औरतें  हस्तमैथुन से हीं संतुष्ट हो जाती हैं तो कई दफा कई औरतों में सिर्फ सेक्स के ख्याल मात्र से हीं ऑर्गेज्म हो जाता है। कई बार या मैं कहूं कि आमजीवन में  एक औरत को पूरी तरह से तसल्ली के लिए एक साथी की जरूरत होती है। औरतों में सेक्स की ख्वाहिश या इच्छा जगाने के कई तरीके हैं, जैसे किसी को यौन अंगों से छेड़-छाड़ करने के बाद सेक्स की जरूरत होती है तो किसी को किस करने के साथ हीं उत्तेजना आ जाती है। कुछ औरत अपने साथी परहावी होकर सेक्स की तसल्ली महसूस करती हैं और इसका दायरा बहुत बड़ा होता है। एक ओर अहम बात यह है कि आधुनिक जमाने में अब कई तरह की फिल्में अर्थात पोर्न फिल्में बन रही है जो महिला और पुरूषों के सोच को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है जो औरतों और पुरूषों में उत्तेजना और कामुखता को बढ़ाये। लेकिन इन सबके बावजूद मनोवैज्ञानिकों को पूरी तरह से यह नहीं पता कि औरतों के अंदर सेक्स की चाहत कैसे जगती है? बल्कि ये भी नहीं पता कि ये चाहत होती कैसी है? ये दिमाग़ से शुरू होती है या शरीर के किसी और ख़ास हिस्से से? हालांकि सेक्स की ज़रूरत न महसूस होने की कुछ वजहें तो अब पक्के तौर पर मालूम हो चुकी हैं। कामकाजी महिलाओं में घर और दफ़्तर के तनाव के कारण सेक्स की ख़्वाहिशों कम हो जाती है। इसी तरह से बच्चे पैदा होने के बाद भी महिलाओं को सेक्स की कम ज़रूरत महसूस होने लगती है। साथ हीं यह भी सत्य है कि महिलाओं के ऊपर आस-पास के माहौल का बहुत असर पड़ता है और अगर तनाव ज्यादा बढ़ जाता है तो उनके अंदर सेक्स की चाहत कम होना स्वाभिक है। लेकिन ये सब समस्याएं ऐसी है कि थोड़ी सी सावधानी बरतने के साथ इनसे बचा जा सकता है और सेक्स लाईफ को इन्जॉय किया जा सकता है। महिलाओं में सेक्स की कम इच्छा की परेशानी दूर करने के कई इलाज आज उपलब्ध हैं। हालांकि इनमें से कोई भी कामयाबी की सौ फ़ीसद गारंटी नहीं देता। आज मनोवैज्ञानिक तरीक़े से भी महिलाओं में सेक्स की ख़्वाहिशों को फिर से ज़िंदा किया जा रहा है तथा ध्यान और योग एक ऐसा माध्यम है जिसके निरंतर अभ्यास से सेक्स लाईफ को आनंदमई बनाया जा सकता है। कई लोग महिलाओं में सेक्स की इच्छा जगाने के लिए फीमेल वियाग्रा को भी तरजीह देते हैं, जबकि किसी औरत के अंदर सेक्स की ख़्वाहिश के कई पहलू होते हैं। जिनके बारे में जानना बेहद जरूरी है और फिर उसी के मुताबिक व्यवहार करना चाहिए या फिर इसका इलाज करना चाहिए। यह बात तो सर्वविदित है कि महिलाएं अपने अंदर सेक्स की कम चाहत को तब तक परेशानी के तौर पर नहीं देखतीं, जब तक वो किसी रिश्ते में नहीं बंधतीं। रिश्ते में बंधने के साथ हीं साथी की मांग का दबाव उन्हें सेक्स की कम इच्छा की दिक़्क़त का एहसास कराता है और यह कतई जरूरी नहीं है कि साथी की इच्छा के बराबर ही महिलाओं को भी सेक्स की चाहत महसूस हो। इसलिए यह  बेहतर होगा कि दोनों मिल-बैठकर इस बारे में बात करें और एक दूसरे की ज़रूरतों और ख़्वाहिशों को समझने की कोशिश करें। जहां तक ख़्वाहिशों की बात है, इसका कोई ओर-छोर नहीं। ये अलग-अलग इंसानों में ही नहीं, कई बार एक ही इंसान के अंदर अलग-अलग होती है। किसी में कम होती है तो किसी में ज़्यादा होती है। हालांकि यह कहना बेहद हीं मुश्किल है कि किसी इंसान में सेक्स की इच्छा या ख्वाहिश कितनी कम है या फिर कितनी ज़्यादा है। क्योंकि आजतक सेक्स की चाहत को मापने का कोई पैमाने का आविष्कार नहीं हुआ  है।  (यह लेख मेरे अपने विचार हैं, यदि किसी व्यक्ति के भावना को किसी भी रूप में ठेस पहुंचे तो उसके लिए क्षमा याचना है।)
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